अमृत कलश

जिन खोजा तिन पाईयां

इस दुनियां में न तो कुछ पाने योग्य है और न कुछ त्यागने योग्य…तुम्हारी चेतना एक अदृश्य आकर्षण से आबद्ध है…जो अवचेतन द्वारा विशेष तरंगों का प्रसार करती है….उन तरंगों के मार्ग में जो उसके विपरीत भाव की तरंग होती है…वह तुम्हें उससे जोड़ देती है…जो स्व भाव की तरंग होती है, वह उसे दूर कर देती है…ज्योतिष इसे मंगल शुक्र से जोड़ देता है…दुनियां इसे भाग्य से जोड़ देती है और विज्ञान डोपामाइन, नॉरएड्रेनेलिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन के माथे मढ़ देती है….लेकिन तीनों ही उस प्रकृति के चक्र की अनूठी योजना को नहीं समझ पाते हैं….यहां जो कुछ घट रहा है, वह पूर्व निर्धारित होता है….दूसरे देश से चलकर कोई स्त्री दूसरे देश के पुरुष को जीवन समर्पित कर देती है और पुरुष उसके साथ हो जाता है…यह असामान्य लगता है, पर यह प्रकृति का खेल है…माया है…जो सक्रिय है…हर कालखंड में….इसलिए उसे जिसको जोड़ना है, उसे आपकी अवचेतन की तरंगों से अवगुंठित कर देती है…बाह्य रूप से इसे समझ पाना दुरूह है….इसलिए संसार में होने को पहचानिए…तुम हुए क्यों हो….!क्या ऐसी आवश्यकता है कि तुम्हें होना पड़ा…तुम्हें भेजा गया…क्यों भेजा गया….बस यही सबसे महत्वपूर्ण खोज है…..!

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