अमृत कलश
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मन ही तुम्हारे बंधन और मोक्ष का कारण है

आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री

अधिष्ठाता, श्री पीताम्बरा विद्यापीठ सीकरीतीर्थ

एकही साधे सब सधैं

शास्त्रों ने कहा है कि मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयाे अर्थात् मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा गया है। जिस प्रकार चंद्रमा का प्रभाव नित्य घटता बढ़ता है, उसी कारण से मन में निरंतर चंचलता का वास होता है…जैसे जैसे चंद्रमा कृष्ण पक्ष की ओर बढ़ता हुआ अमावस्या को अस्त रहता है, उसी प्रकार मन की गतिविधि कुंद होती चली जाती है…मन खिन्नता से भरने लगता है और अमावस्या यदि केतुदृष्ट हो जाए अर्थात् बिना विचार किए किसी कर्म में लग जाए तो जातक आत्मघात कर लेता है। इसी प्रकार जब शुक्ल पक्ष की ओर चंद्रमा बढ़ता है तो मन उल्लास में होता है, पूर्णिमा आते आते मन पूरे आवेश में ऊर्जान्वित होता है, ऐसे में यदि किसी कारण बुद्धिहीनता हो जाए तो भी प्रबल आत्मघात योग जन्म ले लेता है…इसीलिए सूर्य के आश्रय के बिना दुष्टदृष्ट मन जातक को आत्मघात के लिए प्रेरित कर सकता है।
शास्त्रों ने मन के चेतन और अवचेतन, दो भाग किए हैं..सूक्ष्म स्तर पर उसके चार भाग किए हैं। मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार…यदि ये विकृति को प्राप्त हो जाएं, वात, पित्त और कफ का संतुलन बिगाड़ देते हैं और शरीर रोगों का घर हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों ने, ऋषियों ने करुण रस को महत्व दिया है….जब आप करुणा से भरे होंगे तो ईर्ष्या, घृणा, असंतुष्टि, क्रोध और शंका को कोई स्थान न मिल सकेगा…प्राणीमात्र में स्वयं का आत्म प्रकाश ही दिखाई देगा, किसी का अहित भाव में नहीं आ सकेगा…और सहजता, सरलता का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा…लेकिन यह तभी संभव है, जब किसी सद्गुरु की कृपा आपके शिर पर हो…क्योंकि मनुष्य जन्म से ही कामक्रोधादि कुप्रभावों से ग्रस्त होता है और शरीर में साठ प्रतिशत जलभाग होने के कारण उसमें संवेदनशीलता का स्तर प्रत्येक अन्य तत्व से अधिक होता है…और जल का स्वभाव होता है पतनशीलता का…जहां जहां गहरा होगा, नीचा होगा, जल उसी ओर प्रवाहित होता चला जाएगा…कोई कितना ही दबाव बनाकर उसे ऊपर की ओर प्रवाहित करे, वह नीचे की ओर ही गिरेगा…यही कारण है कि छोटे बच्चे बुरी आदतों को जल्द सीख लेते हैं और अच्छी आदतों के लिए माता पिता और परिजनों के प्रयास आवश्यक होते हैं। प्रायः देखा गया है कि कुछ लोग बच्चों को गाली सिखाते हैं या बच्चों के सामने गाली प्रयोग करते हैं और बच्चे उसका निहितार्थ न समझकर गाली दोहराने लगते हैं। इसलिए मन को सही मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक होता है।
मनोदशा ही प्रत्येक शुभ और अशुभ कार्यों की उत्तरदायी होती है। यदि ज्योतिषशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, विज्ञान और सामाजिक अनुसंधान के सभी ग्रंथों और पद्धतियों का निचोड़ करें तो मन को निरंतर भोजन की आवश्यकता होती है और मन का भोजन है विचार….जैसा विचार स्थापित होगा, मनुष्य वैसा ही कर्म करने लगेगा…यदि विचार पूर्ण पुष्ट हुआ तो लंगड़ा आदमी हिमालय की छोटी पर अपना ध्वज लगा सकता है…इसलिए मन को मजबूती आवश्यक है। ऋषियों ने गहन शोध किए और पाया कि केवल मन को साध लेने से सभी कार्य पूर्ण किए जा सकते हैं। इसलिए मन को प्रेरक साहित्य और समाज के हितार्थ विचार मनुष्य को समाज का अग्रणी बना सकते हैं….इसके लिए आवश्यक है अवचेतन के संग्रह में उन्नत विचारों का होना और उनका सक्रिय होना….जो उससे परिपूर्ण होता है….उसे संसार कभी पराजित नहीं कर सकता।
आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री

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