अमृत कलश
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चेतना ही तुम्हारी मुक्ति का द्वार है…!

आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
श्रीपीतांबरा विद्यापीठ सीकरीतीर्थ

जीव, श्वास की प्रक्रिया से उत्पन्न होकर श्वास की हानि से ही शरीरमुक्त होता है। उसके साथ उसकी चेतना सदैव अपना प्रभाव बनाए रखती है…चेतना, विद्युत तरंग की भांति प्रगट होकर आकाशमंडल से आती है और उसी में लौट जाती है…वही आपके सब कर्मों और भाग्य का लेखा जोखा रखती है…उसी के प्रभाव से चेतना पुनः स्फूर्ण होती है और शरीर में व्याप्त हो जाती है…वह एक विद्युत तरंग सा व्यवहार करती है….जो उस क्षण जागा है, उसकी जागृति है…जो सोया है, उसकी सुषुप्ति है और जो अर्द्धमूर्छित है, वह स्वप्न है और जो अर्धजागृत है…वह प्रपंच से भीतर की यात्रा के पथ पर है… चेतना का उर्ध्वगमन और अधोपतन ही जन्म और मृत्यु के कारक होते हैं….चेतना कभी रुकती नहीं है…वह निरंतर है, उसका विस्तार ही भौतिक- अभौतिक सब है…वही जागी हुई है, वही स्वप्न में है और वही सुषुप्त है…तीनों, चेतना के ही रूप हैं…और चेतना ही वह व्यवस्था है, जो तारों और नक्षत्रों के प्रभाव से जुड़कर हमारा मार्ग बताती है, बाधाओं से पार पाने का भी और बाधाओं से घिर जाने का भी…! चेतना की ऊर्ध्व गति बाधाओं को नष्ट करती है तो उस पर सूर्य का प्रभाव होता है और जब उसका पतन होता है तो वह चंद्रमा के प्रभाव में होती है…इस गति अवगति से ही श्वास को निरंतरता मिलती है…जैसे ही गति और अवगति का चक्र पूर्ण होता है, चेतना विस्तार को प्राप्त हो जाती है और विराट में विलीन हो जाती है…लोग मृत्यु का शोक मनाते हैं….
तुम चाहते हो कि मुक्ति हो तो वह तुम्हें उस इच्छा के योग्य बनाती है और बाधाओं का क्रम शुरू होता है, जब तुम बाधाओं से संघर्षकर इस योग्यता को पा लेते हो तब वह चेतना तुम्हारे अवचेतन में रुके कर्मविपाक को नष्ट कर देती है और संघर्ष से कर्म का फल पाकर चेतना शुद्धता की ओर बढ़ती है, ऊर्ध्वप्रवाह का प्रभाव, जब अवचेतन पर पड़ता है तो किल्विष को नष्ट होना ही होता है…उसी को उपनिषद तमसो मा ज्योतिर्गमय कहते हैं…क्योंकि वह असत से सत की ओर अग्रसर होती है…और मृत्यु से पार पाकर अमृततत्व को प्राप्त हो जाती है….लोक में उसी को ईश्वरीय प्राप्ति कहा जाता है…वस्तुतः चेतना का प्रभाव कितना प्रबल है, शक्ति उसी आधार पर समुच्चय में होती है। चेतना ही परावर्तित होकर शक्ति रूप में प्रगट होती है और आप जो चाहते हैं, उसे पूर्ण करती है…लेकिन ध्यान रहे कि वह असत, तमस और मृत्यु से दूर हो….उसके लिए आपको समर्पण करना होगा…क्योंकि चेतना का केंद्र विराट है…और विराट के अंश होने से असीम शक्तियां उसकी अनुगामिनी हैं…वे शक्तियां सबकुछ करने की अवस्था में हैं। उनकी प्रबलता निर्धारित करती हैं कि क्या होगा…इसमें सबसे बड़ी बाधा है अहंकार…जो उस चेतना के विस्तार को संकीर्णता में ले जाना चाहता है, जिस पर तमस का प्रभाव है….लेकिन, जैसे ही आपकी अवधारणा उस विराट को समर्पित होती हैं, अहंकार अवधारणाओं के साथ लुप्त हो जाता है…चेतना विस्तार पा जाती है और प्रगट होता है प्रेम…करुणा….जिसके बाद प्रश्नबोध ही नहीं रहता…न विचार होता है और न ही अवधारणा…बस शक्ति को समर्पित हो जाना है….फिर कुछ शेष नहीं रहता…इच्छाएं प्रगट नहीं होती, वे विचार को भी ऊर्ध्वगति से जोड़ देती हैं…क्षुद्रता नष्ट हो जाती है और जीव विराट की शक्तियों को प्राप्त हो जाता है….
आपके समर्पण से उपजी ऊर्जा, चेतना को शक्तिसंपन्न कर देती है…वह शक्ति सबकुछ स्वयं करती है, जो आप चाहते हैं….भक्ति भी और मुक्ति भी…..वही आपको विस्तार देती है, वही स्वप्नों को साकार करती है, वही आपको संभालती है और जीवन का होना स्थापित करती है….जिसने चेतना को साध लिया, उसका अवचेतन सिद्ध हो गया…और अवचेतन से अधिक शक्तिशाली कोई नहीं….
बंधन और मोक्ष उसी के पक्ष हैं….वह चेतना ही आपकी मुक्ति का द्वार है।

आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री

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