गिरिजापुरपति भगवान् श्रीवृद्धेश्वर बूढ़ेनाथ

डॉ. जितेंद्रकुमार सिंह ‘संजय’
विक्रम संवत् 1720 (1663 ई.) के प्रयाग-अर्द्धकुम्भ में गिरिजापुर के श्रीवृद्धेश्वरनाथ-मन्दिर के प्रथम महन्त भैरव गिरि जी महाराज सम्मिलित हुए थे। उसी अर्द्धकुम्भ में नागा-संन्यासियों एवं वैष्णव-साधुओं के मध्य हुए विवाद के प्रसंग में महन्त भैरव गिरि जी महाराज का नाम श्री वेदप्रकाश गर्ग ने अपने लेख ‘वैष्णव अनी अखाड़े’ में रेखांकित किया है।
गिरिजापुर के भगवान् श्रीवृद्धेश्वरनाथ कन्तित-विजयपुर के गहरवार राजवंश के कुलदेवता हैं। भगवान् श्रीवृद्धेश्वरनाथ की लोकप्रसिद्धि बूढ़ेनाथ महादेव के रूप में है। भगवान् श्रीवृद्धेश्वरनाथ उपाख्य बूढ़ेनाथ की स्थापना वर्तमान मिर्ज़ापुर नगर में उस समय हुई थी, जब यह नगर देवनदी गंगा के दक्षिणी तट पर बसा ‘गिरिजापुर’ नाम का एक छोटा-सा गाँव था। मध्यकालीन भक्ति-साहित्य में गिरिजापुर गाँव का उल्लेख गिरिजापत्तन के रूप में भी मिलता है। भक्तकवि महात्मा कृष्णदास, जो सन् 1798 ई. में विद्यमान थे, की पुस्तक ‘माधुर्य-लहरी’ में गिरिजापुर का उल्लेख इस प्रकार हुआ है–
विन्ध्य निकट तट सुरधुनी, गिरिजापुर वर नाम।
हरिभक्तन के आश्रयन, कृष्णदास विस्राम।।
गंगा के दक्षिण तट पर बसे गिरिजापुर गाँव का श्रीवृद्धेश्वरनाथ-मन्दिर कन्तित-विजयपुर के गहरवार राजवंश की आस्था का प्रमुख केन्द्र था। इसलिए कालान्तर में गहरवारों के प्रतिष्ठित ठिकानों में भी श्रीवृद्धेश्वरनाथ (बूढ़ेनाथ) के मन्दिर बनाये गये, जिनमें विजयपुर और कुशहा के श्रीवृद्धेश्वरनाथ (बूढ़ेनाथ) मन्दिर अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। गहरवारों की दूसरी शाखा में माण्डा और भरारी के श्रीवद्धेश्वरनाथ (बूढ़ेनाथ) मन्दिर की लोकख्याति प्रयागराज जनपद में बहुत अधिक है। कालान्तर में गहरवारों की श्रीवृद्धि और पुरुषार्थ के प्रतीक के रूप में श्रीवृद्धेश्वरनाथ ही श्रीवृद्धीश्वरनाथ हुए गये। वृद्धीश्वरनाथ के ही अपभ्रंश ‘बढ़ौना बाबा’ हैं, जो उपरौध-क्षेत्र (वस्तुतः अपरौध-क्षेत्र) के पतार कलाँ में विराजमान हैं।
श्रीवृद्धेश्वरनाथ (बूढ़ेनाथ) एवं श्रीवृद्धीश्वरनाथ (बढ़ौना बाबा) की परम्परा तब से प्रारम्भ होती है, जब से कन्नौज का गहरवार राजवंश विन्ध्यक्षेत्र में स्थापित हुआ। महाराजाधिराज जयचन्द्र के अनुज महाराज माणिक्यचन्द्र की वंश-परम्परा में महाराज दादूराय (1661–1681 ई.) अत्यन्त लोकप्रसिद्ध शासक हुए। आधुनिक हिन्दी के जनक भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने लिखा है कि गिरिजापुरेश्वर दादूराय के मरणोपरान्त शोकसन्तप्त गिरिजापुरवासियों ने उनकी स्मृति में कजरी नामक एक नये लोकस्वर की रचना की, जो कालान्तर में कजली अथवा कजरी के नाम से जगद्विख्यात हुई। इन्हीं महाराज दादूराय के प्रपौत्र महाराज अनूपशाह (1721–1741 ई.) हुए, जिन्होंने अपने युवराजत्वकाल में बाँदा-अतर्रा और फूलपुर से व्यापारियों को बुलाकर गिरिजापुर में बसाया और गिरिजापुर गाँव को नगर के रूप में विकसित किया। उस समय तक श्रीवृद्धेश्वरनाथ-महादेव का माहात्म्य काशी-प्रयाग और आस-पास के जनपदों तक फैल चुका था। वस्तुतः मन्दिर की स्थापना महाराज दादूराय के पिता महाराज कनक सिंह (1641–1661 ई.) के समय में ही हो गयी थी। स्थापना के समय ही श्रीवृद्धेश्वरनाथ-मन्दिर के गर्भगृह में एक शिलालेख उत्कीर्ण किया गया, जिसमें लिखा हुआ है–
गिरिजापुरवासी जनहिं, करत सदैव सनाथ।
वृद्धेश्वर उपनाम पुनि, श्री शिव बूढ़ेनाथ।।
निज सेवक समुदाय के, करत मनोरथ सिद्ध।
बृद्धेश्वर उपनाम पुनि, बूढ़ेनाथ प्रसिद्ध।।
जो चाहत सुख सुयश सुत, सम्पति सद्गति साथ।
सेवहि सहित सनेह नित, श्री शिव बूढ़ेनाथ।।
गति न आन जेहिं की अहै, अतिशय अबुध अनाथ।
तेहि की गति दुहु लोक में, श्री शिव बूढ़ेनाथ।।
श्रीवृद्धेश्वरनाथ-मन्दिर के स्थापना के समय इस पीठ के प्रथम पीठाधीश्वर महन्त भैरव गिरि जी महाराज थे। तब से आजतक कुल अट्ठाईस महन्त इस परम पावन पीठ के अधीश्वर हुए। बाईसवें महन्त हरिदाससहाय गिरि जी महाराज संस्कृत और हिन्दी के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने संस्कृत भाषा में ‘रामाश्वमेध’ महाकाव्य की रचना की थी। रामाश्वमेध महाकाव्य की पाण्डुलिपि नागरीप्रचारिणी सभा काशी में संरक्षित है। महन्त हरिसहायदास गिरि जी महाराज के ‘रामाश्वमेध’ महाकाव्य की पुष्पिका में मिर्ज़ापुर के पूर्व नाम ‘गिरिजापुर’ का उल्लेख किया गया है–
सकल मनोरथदात्री धात्री जगतासुरसुराध्या।
विलसत्प्रत्यक्ष कला वरदा विन्ध्येश्वरी जयति।।
श्रीमद्रामशिरोरत्नं तत्समीपे विराजते।
मिरिजापुर नामाद्य पूर्वं तु गिरिजापुरे।।
गङ्गा तटेति विमलं शोभितं जनसङ्कुलं।
समग्रैश्वर्य सम्पन्नं सर्वलोक मनोहरम्।।
यत्र संन्यासि सिद्धा वसन्ति शिवपूजकाः।
ज्ञानिनो निर्मला शान्ता दानाभेदविवर्जिता।।
साधवो निर्मला शान्ता यत्र सन्ति विरागिणाः।
शिवशक्ति रमाराम भेद ज्ञानमिवारका।।
वैष्णवाश्चापि शौराश्च शाक्ता शासका तथा।
महात्मानो महाघोरा अद्वेषारः परस्परं।।
ब्रह्मणः पण्डिता यत्र गुणवन्तश्च भूरिशः।
श्रीमद्राम प्रसादाद्याः शब्दब्रह्म निरूपिणः।।
महन्त हरिदाससहाय गिरि जी महाराज के उत्तराधिकारी महन्त भैरव गिरि द्वितीय मध्यप्रदेश की चन्देरी रियासत के राजकुमार थे। महन्त भैरव गिरिजी महाराज (द्वितीय) के आशीर्वाद से ही रीवा-नरेश बान्धवेश महाराजाधिराज रघुराज सिंह जूदेव का वंश चला। जिस दिन महाराजाधिराज रघुराज सिंह के पुत्र युवराज वेंकटरमण सिंह का जन्म हुआ, उसी दिन महन्त भैरव गिरि जी महाराज कैलासवासी हुए। सन्त-समाज में यह प्रसिद्ध है कि स्वयं महन्त भैरव गिरि जी महाराज ही वेंकटरमण सिंह के रूप में महारानी शिवदान कुँवरि जू देई देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। गिरिजापुर (मिर्ज़ापुर) नगर के दक्षिणी छोर पर नागाकुटी का निर्माण रीवा-नरेश बान्धवेश महाराजाधिराज वेंकटरमण सिंह जूदेव ने ही करवाया। नागाकुटी और नगर के मध्य में एक छोटी-सी नदी है। उस पर सेतु का निर्माण महाराजाधिराज वेंकटरमण सिंह जूदेव के पुत्र बान्धवेश महाराजाधिराज गुलाब सिंह जूदेव ने करवाया। भारतीय स्वतन्त्रता के 78 वर्ष व्यतीत हो जाने के पश्चात् आज भी उस नदी पर वही सेतु है।
श्रीवृद्धेश्वरनाथ-मन्दिर के छब्बीसवें महन्त महन्त मदन गिरि जी महाराज डुमराँव के परमार राजवंश के सदस्य थे। उनके समय में कन्तित-विजयपुर के गहरवार राजवंश के प्रत्येक ठिकानेदार श्रीवृद्धेश्वरनाथ-मन्दिर से जुड़े हुए थे। महन्त मदन गिरि जी महाराज के कैलासवासी होने के पश्चात् यह परम्परा किंचित् खण्डित हुई। गहरवारों का बूढ़ेनाथ-मन्दिर में आना-जाना कम हो गया, किन्तु वर्तमान में यह परम्परा पुनः जीवन्त हो उठी है।
श्रीवृद्धेश्वरनाथ-मन्दिर गिरिजापुर के पीठाधीश्वरों की सूची निम्नांकित है–
- महन्त भैरव गिरि जी महाराज (प्रथम)
- महन्त जमुना गिरि जी महाराज
- महन्त दुर्गा गिरि जी महाराज
- महन्त शंकर गिरि जी महाराज
- महन्त गिरिजानन्द गिरि जी महाराज
- महन्त शशिधर गिरि जी महाराज
- महन्त विष्णुकान्त गिरि जी महाराज
- महन्त राजेश्वरानन्द गिरि जी महाराज
- महन्त सर्वेश्वरानन्द गिरि जी महन्त
- महन्त चन्द्रशेखर गिरि जी महाराज
- महन्त सोमेश्वर गिरि जी महाराज
- महन्त मोहन गिरि जी महाराज
- महन्त रघुनाथ गिरि जी महाराज
- महन्त आनन्द गिरि जी महाराज
- महन्त रामेश्वर गिरि जी महाराज
- महन्त कृष्णानन्द गिरि जी महाराज
- महन्त नर्मदानन्द गिरि जी महाराज
- महन्त विजयविक्रम गिरि जी महाराज
- महन्त रामस्वरूप गिरि जी महाराज
- महन्त गजानन्द गिरि जी महाराज
- महन्त बजरंग गिरि जी महाराज
- महन्त हरिदाससहाय गिरि जी महाराज
- महन्त भैरव गिरि जी महाराज (द्वितीय)
- महन्त हनुमान गिरि जी महाराज
- महन्त चन्द्रभान गिरि जी महाराज
- महन्त मदन गिरि जी महाराज
- महन्त शिवानन्द गिरि जी महाराज
- महन्त डॉ. योगानन्द गिरि जी महाराज।
श्रीवृद्धेश्वरनाथ (बूढ़ेनाथ) मन्दिर गिरिजापुर (मिर्ज़ापुर) की सनातन सांस्कृतिक आस्था का प्रमुख धार्मिक केन्द्र है। शिवरात्रि के अवसर पर इस मन्दिर से निकलनेवाली पालकी-यात्रा का शुभारम्भ 1860 ई. में हुआ था। पालकी-यात्रा तब से अबतक यथावत् है। श्रावण मास में मासपर्यन्त चलनेवाले रुद्राभिषेक की प्राचीन परम्परा रही है। सन्त-समाज में यह तथ्य प्रचलित है कि काशीपुरपति भगवान् शिव दिन में विश्वेश्वर विश्वनाथ के रूप में काशीपुरी और रात्रि में वृद्धेश्वर बूढ़ेनाथ के रूप में गिरिजापुरी में निवास करते हैं–
गिरिजापति विश्वेश के, दो निवास हैं खास।
दिन में काशी रात में, गिरिजापुर में वास।।
गंगा के उत्तर सदा, विश्वनाथ दरबार।
दक्षिण गिरिजापुर करे, वृद्धेश्वर जयकार।।
प्राचीनकाल में मन्दिर-परिसर का बृहत्तर स्वरूप था, किन्तु शनैः शनैः नगरीय विस्तार और पूर्वाचार्यों के अनवधान के कारण मन्दिर का बहुत कुछ भाग अतिक्रमित हो गया है। इसके बाद भी मन्दिर का शिल्प और स्थापत्य देखते बनता है। लगभग 385 वर्ष पूर्व बने मन्दिर का गर्भगृह जर्जर हो गया है। धीरे धीरे गर्भगृह के नीचे की भूमि धँस रही है, जिसके कारण चारों स्तम्भ अपने स्थान से खिसकते जा रहे हैं। इसी के साथ यह भी बताना आवश्यक प्रतीत हो रहा है कि भगवान् बूढ़ेनाथ का श्रीविग्रह भूमितल से चार फीट नीचे कुण्ड में विराजमान है। मिर्ज़ापुर की सीवर-प्रणाली ठीक न होने के कारण विगत अनेक वर्षों से बरसात में नाली का गन्दा पानी कुण्ड में प्रविष्ट कर जाता है, जिससे न केवल गर्भगृह की शुचिता नष्ट होती है, अपितु गर्भगृह का आधारतल भी धँसता जा रहा है। यदि समय रहते इसका उचित निराकरण और गर्भगृह का पुरातात्त्विक दृष्टि से जीर्णोद्धार नहीं कराया गया, तो एक बृहत्तर विरासत अतीत का अध्याय बन जायेगी।
योगी आदित्यनाथ जी महाराज जैसे धर्मचक्रवर्ती मुख्यमन्त्री के शासनकाल में पूरे प्रदेश के तीर्थों का उद्धार हुआ है। उत्तरप्रदेश के सनातन गौरव की धर्मध्वजा आज पूरे विश्व में अपनी सार्थक उपस्थिति से गौरवान्वित है। इसी परम्परा में योगी आदित्यनाथ जी की कृपा-दृष्टि गिरिजापुर के इस प्राचीन मन्दिर पर भी पड़े और इसका संरक्षण तथा जीर्णोद्धार हो, जिससे गिरिजापुर की सनातन आस्था का यह प्राचीन केन्द्र हिन्दू-जागरण का अहर्निश कार्य करता रहे।



