आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
श्रीपीतांबरा विद्यापीठ सीकरीतीर्थ
जीवन जागने के लिए है और जगाने के लिए है। जब तक तुम अपनी शक्ति को नहीं पहचानोगे, सब व्यर्थ रहेगा…धन संपत्ति या कोई भी भौतिक वस्तु तुम्हारे साथ नहीं जाएगी। लेकिन इसके बिना तुम रह न सकोगे…इसलिए संपदा का अस्वीकरण करना भी तुम्हें मूर्ख मानना है…इसलिए उठो और अपने जीवन के रहस्य को समझो! अपनी जीवनी शक्ति को आध्यात्मिक रूप से सक्रिय करो…आध्यात्मिक का अर्थ स्वयं को जानने से है, न कि मंदिरों मंदिरों भटकने से…और मंदिर जाते भी हो तो उसके परिणाम भी समझ लो! भारत में तो मंदिर सरकारी कमाई के अड्डे बन गए हैं और सरकारें दोनों हाथों से तुम्हारे धन का दुरुपयोग करती हैं…तुम्हारे दर्शन का लाभ होने के स्थान पर हानि होती है…जब जब तुम किसी सरकारी कब्जे के मंदिर में प्रसाद चढ़ाते हो…तुम अपने पूर्वजों के पुण्यों को भी नष्ट कर देते हो…इसलिए मंदिरों में न जाकर अपने अन्तस में बैठे उस ईश्वर को जाग्रत करो और अपना उद्धार करो! स्वयं को जानो कि तुम कितने शक्तिशाली हो!
तुम्हें जीवन के उत्कर्ष का अनुभव पाना हो तो डिग्रियों में मत उलझना…डिग्रियां केवल कागज का टुकड़ा भर हैं…उन्हें रद्दी में भी बेचो तो कोई मूल्य नहीं मिलेगा…और किताबें…तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन…क्योंकि ये भी तुम्हें केवल उलझाने के लिए ही बनी हैं…जीवन की वास्तविक शिक्षा तुम्हें अनुभव से मिलती है, जो न किताबों से पाया जा सकता है और न ही किसी डिग्री के कागज पर उतर सकता है…! ईश्वर ने तुम्हें मानव बनाया, लेकिन तुमने किताबी चक्कर में मानवता को ही विकृत कर डाला…!डिग्री पाकर किताबों के बोझ तले दबे तुम किसी पशु से भी गए गुजरे रह गए…! क्योंकि तुम अपनी प्रकृति को भी न समझ पाए…! किताबों ने तुम्हें भ्रमित कर दिया और डिग्रियां तुम्हें अहंकार से भर गईं….! तुम मानवता की सीख से दूर हो गए…!किताबों में तुम्हें चालाकियां और धूर्तता से दूसरे की जेब खाली करने का विज्ञान पढ़ाया गया और डिग्रियां तुम्हें वाचाल बना गईं….! तुम्हें इंसान रहने ही न दिया…!
एक समय था…, जब हर गांव में गुरुकुल थे और हर गुरुकुल में तुम्हें स्वयं की योग्यता को जानने समझने का अवसर दिया जाता था। तुम्हें जीना सिखाया जाता था। तुम्हारी विद्या विमुक्त करती थी, जिससे तुम संसार को जीना सिखा सकते थे…! तुम्हें पशुता से मुक्त रहने का अभ्यास कराती थी…! ज्ञान की वह परंपरा, तुम्हें मानवता को ज्योतित करने के लिए न केवल प्रेरक थी, बल्कि प्राणीमात्र के कल्याण का भाव जाग्रत करती थी…!
सर्वे भवन्तु सुखिनः का उद्घोष करने की तुम्हारी उस क्षमता को जंग कैसे लग गया….! वे क्या कारण रहे कि तुम्हें अपनी लोक परंपराओं से दूर होना पड़ा…! वे क्या कारण रहे कि तुम्हें अपनी ज्ञान परंपरा से दूर होना पड़ा…! वे क्या कारण रहे कि समस्त संसार को प्रकाशित करने वाले ज्ञानचक्षु स्वयं ही अंधकार को प्राप्त हो गए….! शस्त्र और शास्त्र का समन्वय किस गली में खो गया, तुम समझ ही न सके…!
क्योंकि तुम्हे अपने आनंद में अपने सुरक्षा कवच का ध्यान ही न रहा…! अपने शत्रुबोध को तुमने नष्ट हो जाने दिया…! एक अदृश्य मूर्छा के आवरण में तुम कब समा गए, तुम्हें पता ही न चला…!
सनातन की समस्त शक्तियां तुम भूल बैठे। तुम खुद को भूलकर दूसरे के भाव में ही सम्मोहित हो गए…उसी सम्मोहन और आत्मविस्मृत अवस्था से मुक्त करने के लिए आगम निगम की विद्याएं स्वयंप्रभा होकर तुम्हें जगाने के लिए उद्यत हैं। इसलिए अब तुम नींद से जागो! क्योंकि अब भोर होने को है….! समस्त शक्तियां मिलकर तुम्हारा प्रशस्तिगान गाने को सज्ज हैं…! तुम्हारे अभिनंदन में पलक पांवड़े बिछाए खड़ी हैं…! इसलिए किताबों की बेहोशी से बाहर आओ…! डिग्रियों के अहंकार से बाहर आओ…! वे तुम्हारी परतंत्रता की बेड़ी मात्र हैं…! जानो कि तुम्हारा जन्म क्यों हुआ है…! तुम्हारे जीने का उद्देश्य क्या है…! तुम्हारा मार्ग क्या है….! जुडो अपने जीवन की यात्रा से….! तुम्हारी शक्तियां तुम्हे जगाना चाहती हैं…! वे शक्तियां तुम्हें पुकार रही हैं…!अध्यात्म का अर्थ मंदिरों की घंटियां बजाकर प्रसाद चढ़ना मात्र नहीं है…! अपने भीतर झांकने का है…! अपने भीतर के कचरे को साफ करने का है…! अपने भीतर के बुझे दीपक को जलाने का है…!
उठो…….!
उठो और अपनी शक्ति को पहचानो..स्वयं में सम्मिलित होकर अपना होना सार्थक करो!
जागो और अपने कर्मपथ को समझो…इसलिए उठो! क्योंकि तुम स्वयंप्रकाश हो…! बस बुझे हुए हो…! तुम उठ सकते हो, क्योंकि तुम्हें प्रकाशितकिरने वाली चिंगारी अभी जली हुई है। वह तुम्हारे अन्तस के अंधेरे में भी प्रज्ज्वलित है….बस उसे बाहर तक लाना है….!
उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ गोविंद… उत्तिष्ठ गरुध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु।।
आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
(लेखक राष्ट्रीय ज्योतिष परिषद के अखिल भारतीय अध्यक्ष हैं)
