ज्योतिष
Trending

पर्वों पर बार बार भ्रम क्यों फैला रहे हैं पंचांगकर्ता और ज्योतिर्विद

-आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री

भारतीय पंचांगकर्ताओं और ज्योतिर्विदों को अचानक पता नहीं, क्या हो गया है कि पिछले कुछ वर्षों से हर पर्व, त्यौहार और उत्सव को दो तिथियों में या दो दिन में दिखाकर पर्व के आसपास लगभग एक पखवाड़ा पहले विवाद बनाया जाता है और उसके बाद अपनी अपनी भड़ास निकाली जाती है, अपना ज्ञान परोसा जाता है और दूसरे विद्वान को मूर्ख समझा जाता है। ज्योतिषियों और पंचांगकर्ताओं में भी आपस में ईर्ष्या होने लगती है और ज्योतिषी पंचांगकर्ताओं को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं और पंचांगकर्ता स्वयं को ज्योतिषी से ऊंचा मानते हैं। ऐसा लगता है कि इन लोगों ने जैसे हिंदुत्व को नष्ट करने की सुपारी ले रखी हो। …होली हो, रक्षा बंधन हो, दशहरा हो, दिवाली हो, यहां तक कि स्थानीय लोकपर्व भी हों, सबमें दो दिन बताकर भ्रम फैलाने और चर्चा में बने रहने के लिए पर्व से कुछ दिन पूर्व इस प्रकार की गतिविधियों को प्रसारित किया जाता है और उसके बाद अपनी ढपली अपना राग की स्थिति होने लगती है।
यह स्थिति न तो सनातन के लिए शुभ है, न संस्कृति के लिए शुभ है, न ज्योतिष के लिए शुभ है और न ही पंचांगकर्ताओं के लिए शुभ है। इसका परिणाम विकट होगा। इतना विकट होगा कि न पंचांगकर्ताओं का सम्मान बचेगा और न ही ज्योतिर्विदों का। क्योंकि जिस स्विस एफेमरीज का उपयोग करके ये पंचांग बनाए जा रहे हैं, वे अब सबके लिए सुलभ होने की स्थिति में हैं। पंचांग पढ़ना न जानने वाला भी अब आपको पंचांग के गुण दोष और लाभ हानि बता सकता है। यह तकनीकी का चमत्कार है….जो मानव जाति पर भारी है।

लेकिन सनातन शास्त्रों के विद्वान् पता नहीं, किस ओर जा रहे हैं कि पूरे समाज को ही दिशाहीन करने पर तुले हैं। कथाकारों से पंचांगकारों तक, लहसुन-प्याज से तिथि-पर्व तक सब ओर भ्रम फैलाने का कार्य हो रहा है। जितने मुंह, उतनी बात…! विशेष यह कि सबके अपने अपने तथ्य हैं और अपने अपने तर्क…कोई किसी शास्त्र का उल्लेख करता है तो कोई किसी ग्रन्थ का….लेकिन सब केवल एकपक्षीय कथाक्रम में उलझकर देश दुनियां को भ्रमित करने पर उतारू हैं और अहंकार में चूर हैं। उन्हें उस तथ्य से कोई अंतर नहीं पड़ता कि इसका दूरगामी प्रभाव समाज को धर्म और पर्वों से दूर कर देगा और ज्योतिष को जिस प्रकार पाखंड माना जा रहा है, कर्मकाण्ड को व्यर्थ माना जा रहा है, उसी प्रकार पर्वों का महत्व भी नष्ट हो जाएगा….!
ये यह भूल जाते हैं कि ज्ञान और लोक व्यवहार दोनों ही जीवन रूपी पक्षी के दो पंख हैं। बिना ज्ञान के लोक व्यवहार व्यर्थ है और बिना लोक व्यवहार के ज्ञान का कोई औचित्य नहीं होता है। अतः दोनों पक्षों को समाहित किए बिना समाज को कोई मत देना संभव नहीं है। किसी के व्यक्तिगत अहंकार के कारण समाज को दिशाहीन कर देना क्या उचित है?
शास्त्रों ने कहा है कि
लोकज्ञश्चेन्न वेदज्ञो वेदज्ञश्चेन्न लोकवित्।
एकपक्षखगस्येव वाक्यं तस्यावसीदति।।
अर्थात वेदज्ञ यदि लोकव्यवहार से युक्त नहीं है और लाेकव्यवहार का ज्ञाता यदि वेदज्ञ नहीं है तो वे दोनों ही अपूर्ण हैं और एकपक्षीय हैं। जैसे एक पंख से पक्षी नहीं उड़ सकता है, वैसे ही उसकी भी गति नहीं है। इसलिए शास्त्र और लोक व्यवहार, दोनों का साधना आवश्यक होता है।
सनातन की परंपरा के पोषण के लिए पंचांग प्रकाशित करने की परंपरा है। जिसके माध्यम से तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का ज्ञान होता हैं। ये पांच अंग किसी विशेष दिन की शुभता और अशुभता का निर्धारण करने में सहयोग करते हैं। चंद्रमा के घटने-बढ़ने के आधार पर तिथि की गणना होती है। सात दिनों का एक सप्ताह होता है। चंद्रमा जिस तिथि में जिस नक्षत्र में होता है, उस दिन वह नक्षत्र माना जाता है। सूर्य और चंद्र की स्थिति से विशेष योग बनते हैं और तिथि का आधा भाग, जो शुभ-अशुभ कार्यों को दर्शाता है, करण कहा जाता है। इसी के गणनाक्रम से पूर्णिमा से अमावस्या तक तिथियों, नक्षत्रों, दिनों, योगों और करण की अवस्था स्पष्ट होती है और व्रतों, पर्वों तथा संक्रांतियों और दिवस या रात्रि विशेष की स्थिति स्पष्ट होती है।
ज्योतिष की मर्यादा है। वह पंचांग परंपरा से ही संचालित होता है। इस संबंध में जितने भी सिद्धांत हैं, वे मानव जीवन के उत्कर्ष की व्यवस्था के लिए होते हैं, न कि झंझटी करने के लिए। पीयूषधारा में महर्षि गर्ग का वचन है कि
ज्योतिश्चक्रे तु लोकस्य सर्वस्योक्तं शुभाशुभम्।
ज्योतिर्ज्ञानं तु यो वेद स याति परमां गतिम्।।
अर्थात ज्योतिश्चक्र में संसार के सभी जनोंका शुभाशुभ विद्यमान रहता है। जो ज्योतिषशास्त्र को जानता है , वह परमगति ( ब्रह्मसायुज्य ) को प्राप्त होता है।
इसीलिए सूर्य और चंद्रादि ग्रहों को ज्योतिष का नेत्र कहा गया। कहा गया है कि
छन्दः पादौ त वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।
ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते॥
शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।
तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥
(पाणिनीय शिक्षा ४१–४२)
अर्थात वेदरूपी पुरुष के छन्दशास्त्र पैर हैं, दोनों हाथ कल्प हैं, ज्योतिषशास्त्र नेत्र हैं, निरुक्त श्रोत्र हैं, शिक्षा को वेद की नासिका तथा मुखको व्याकरण कहा गया है। अत: वेदांगों के ज्ञान के साथ ही वेदका अध्ययन करनेवाला ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
जब हम पाणिनि के इस सूत्र का अध्ययन करते हैं तो इसमें वास्तविक समस्या का उल्लेख भी स्पष्ट हो जाता है। यहां सूत्र में छंद को पैर, कल्प को हाथ, ज्योतिष शास्त्र को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा का नासिका और मुख को व्याकरण कहा गया है। ये छ: वेदांग कहे गए हैं। वेदांगों में मुख व्याकरण है। संस्कृत व्याकरण एक विस्तृत और सुदीर्घ परंपरा है, जिसमें शब्दों के रूपों (शब्दरूप), क्रियाओं (धातरूप), लिंग, वचन और कारक आदि का अध्ययन किया जाता है। यह वेदों को समझने के लिए एक आवश्यक वेदांग है और इसकी सबसे प्रसिद्ध रचना महर्षि पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी है, जिसे कात्यायन के वार्तिक और पतंजलि के महाभाष्य के साथ त्रिमुनि व्याकरण कहा जाता है। विशेष तथ्य है कि ज्योतिष की उत्पत्ति के सूत्र वेदों में उल्लिखित हैं। इसलिए नेत्र से देखकर मुख से कहा जाते वाला शास्त्र हुआ। लेकिन व्याकरण की दृष्टि से आज निन्यानवे प्रतिशत ज्योतिषी और पंचांगकर्ता व्याकरण के ज्ञान से शून्य हैं। उनके लिए वेद का व्याकरण तो दूर की कौड़ी है, वे संस्कृत भाषा का व्याकरण भी नहीं जानते हैं। न प्राच्य व्याकरण (पाणिनीय) और न नव्य व्याकरण (सिद्धान्त कौमुदी) आदि। जब वे व्याकरण नहीं जानते हैं तो शास्त्रों का उनका अध्ययन भाषा अज्ञान के कारण भ्रमकारी हो जाता है। निरुक्त को स्रोत अर्थात कान कहा, तो वे निरुक्त भी नहीं समझ पाते हैं। निरुक्त वेदों को समझने के लिए आवश्यक, व्युत्पत्ति विज्ञान से संबंधित छह वेदांगों में से एक है, जिसका अर्थ निर्वचन या व्युत्पत्ति है। इसका मुख्य कार्य वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति व अर्थ समझाना है और यह निघंटु नामक वैदिक शब्दकोश की व्याख्या करता है। शब्दों के मूल रूप, प्रकृति और प्रत्यय का स्पष्टीकरण, धात्वर्थ और प्रत्ययार्थ को विशद करना, कठिन और कम प्रयुक्त वैदिक शब्दों का संकलन करके उनके अर्थ बताना, मंत्रों के अर्थ को स्पष्ट करने और देवताओं का निरूपण करना, निरुक्त के अध्ययन के बिना मंत्रों के अर्थ को पूरी तरह समझना कठिन है। निरुक्त भाषा के विकास और शब्दों में देश, काल और अन्य कारणों से होने वाले बदलावों का भी अध्ययन करता है। आधुनिक शास्त्र में इसे एटीमोलॉजी के समान माना जाता है, जो शब्दों की व्युत्पत्ति का अध्ययन करता है।
यही कारण है कि आज जितने भी पंचांग प्रकाशित हो रहे हैं, उनमें से अधिकतम बिना वास्तविक ज्ञान के प्रकाशित हो रहे हैं। क्योंकि पंचांगों का गणित अब विद्वान नहीं कर रहे हैं। वे नेट पर उपलब्ध स्विस एफेमेरीज पर आधरित बनाए जा रहे हैं। वस्तुत: पंचांगों में लिखित कालगणना न तो केवल सूर्य के भ्रमण पर निर्धारित है और न ही मात्र चंद्रमा के भ्रमण पर। वह सौर चांद्र गणना पर निर्भर है। जिसमें मासों की गणना तथा मासों पर आधारित पर्वों की गणना तो चंद्र के आधार पर होती है। लेकिन ऋतुएं सूर्य से निर्धारित होती हैं। चांद्र मासों से ऋतु की संगति बैठाने के लिए लगभग 3 वर्ष में एक अधिक मास जोड़कर चांद्र मासों के व्रतों, त्योहारों आदि को ऋतुनिष्ठ बनाने का उपक्रम किया जाता है।
समस्या यह है कि अधिकांश ज्योतिर्विद पंचांगकर्ता, पंचांग निर्माण सिद्धांतों का अध्ययन नहीं करते हैं।पंचांगकर्ता जिस काल को सूर्य का वार्षिक भ्रमण काल मानकर गणित करते हैं, वह सूर्य के नक्षत्र से चलकर वर्ष भर में पुनः उसी नक्षत्र पर आने का समय होता है। (इसे नक्षत्र वर्ष कहते हैं) उसका मान ऋतुनिष्ठ या वर्षमान से लगभग २४ मिनट अधिक है। ज्योतिर्विद डा. बिजेन्द्र श्रीवास्तव तो और भी स्पष्ट कहते हैं कि प्रत्येक वर्ष वास्तविक ऋतु से २४ मिनट बाद वर्ष आरंभ होने से प्रतिवर्ष ०.०१६५६ दिन के हिसाब से यह अशुद्धि लगभग ७१ वर्ष में १अंश या एक दिन की हो जाती है।
पिछले डेढ़ हजार वर्ष का आयोजन ऋतुनिष्ठ वर्षमान न लेकर नाक्षत्र वर्षमान लेने के कारण यह अशुद्धि २०२५ में २४ दिन की हो गई अर्थात ऋतु २४ दिन ५ घंटे पहले तथा पंचांग की गणना की अशुद्ध ऋतु २४ दिन ५ घंटे बाद आ रही है। वर्तमान पंचांगों की समस्या वर्षमान अशुद्धि के कारण उत्पन्न चांद्र मास और सौर मास में तालमेल की भी है। यह समस्या मात्र खगोलीय या धर्मशास्त्रीय नहीं है, बल्कि समाजशास्त्रीय भी है। जो बात समाज में डेढ़ हजार वर्ष से रूढ़ हो गई है, उसके समाधान के लिए सभी स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है। तात्पर्य यह कि जो पंचांग सृष्टि की वैज्ञानिक और सटीक कालगणना कर सकते हैं, उनसे हमारी संस्कृति और जीवन पद्धति भी जुड़ी है, इसलिए पंचांगों में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

मेरा सभी पंचांगकर्ताओं से विनम्र आग्रह है कि वे आपसी ईर्ष्या छोड़कर, अहंकारमुक्त होकर सनातन के महान दायित्व की पूर्ति करें। ज्ञान का उनका माध्यम भिन्न हो सकता है। लेकिन सनातन को दिशा दिखाने के वे अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकते हैं। इसलिए उनका विशेष दायित्व हो जाता है कि वे स्मार्त और वैष्णव परंपराओं सहित सनातन के सभी संप्रदायों का ध्यान रखते हुए ज्योतिष की महान परंपरा का अनुसरण करते हुए ऐसे पंचांग का निर्माण करें, जो सभी के भ्रम नष्ट करे। …और जो विवाद पर्व से पहले खड़े किए जाते हैं, उन्हें वर्ष भर पहले हुए निर्णयों से संबद्ध करते हुए पूर्व में ही प्रकाशित करें। पर्व के निकट काल में भ्रम नहीं फैलाया जाना चाहिए।

One Comment

  1. ज्योतिषशास्त्र का संबंध खगोलीय गणित से । पञ्चाङ्ग मतलब खगोलीय गणित । तब इन दोनों में स्पर्धा क्यूं?
    अगर आप फलज्योतिषियोंकी बात कर रहे है, तब यह जानना जरूरी है कि, ना फलज्योतिष ना मेष वृष इ. राशी भारतीय वैदिक कालगणनासे है। यह दोनों पाश्चात्य संस्कृतीसे अपनाये है। तब इनका भारतीय वैदिक ऋतुबद्ध कालगणनासे क्या सीधा संबंध हो भी सकता है?
    ऋतुबद्ध वैदिक पञ्चाङ्गसे (ना की प्रचलित निरयण) अगर ज्योतिर्विद संतुष्ट नही हो, उन्हे ईर्षा हो रही हो, तब तो उनको आत्मपरिक्षण करके ज्ञानोपासना करना आवश्यक है।
    (यहाँ सिर्फ प्रथम परिच्छेद पर व्यक्त हुआ हूँ।)

Back to top button