तकनीकी को प्रकृति का मित्र बनाओ

चंद्र शेखर शास्त्री
सूर्य बिना किसी भेदभाव के समस्त पर अपना प्रकाश लुटाता है…क्या उसका कभी अहसास किया…! वायु श्वास की गति निरंतर रखती है, क्या मरुद्गण हो कभी धन्यवाद किया…!
यह पृथ्वी निरन्तर हमारा भार सहती हुई हमारे मल मूत्र, उच्छिष्ट वहन करती है, क्या इसका ऋण उतार पाओगे…!
आकाश हमें सदैव विस्तार की प्रेरणा देता है, क्या उस जैसा बन पाओगे…! …और जल…जल की एक बूंद एक जीवन को जन्म देती है। अग्निपुंज की ज्वाला भी जल रूप में परिवर्तित होकर हमें जन्म देती है और जीवन के विकास के लिए शरीर को जलपूर्ण रखती है, उसकी कमी न हो, उसके लिए प्राकृतिक साधन उपलब्ध कराती है….इन्हीं पंचतत्वों के संयोजन पर यह शरीर पूर्णता को प्राप्त होता है…..
लेकिन मानव ने सभी तत्वों का दोहन कर उन्हें दूषित बना दिया है….इसका दंड तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को भोगना पड़ेगा…उन्हें न शुद्ध वायु तुमने छोड़ी है, न शुद्ध जल छोड़ा है, न आकाशमंडल ही शांत और शुद्ध छोड़ा है और पृथ्वी तुम्हारे कलंकित बोझ से बोझिल है।….केवल एक सूर्य है, जो तुम्हें प्रकाशित तो कर रहा है, लेकिन शेष 4 तत्व दूषित हो जाने के कारण उसका प्रकाश भी दूषित तत्वों के संपर्क में आकर विषाक्त प्रभाव देने लगा है….
अब तो चेत जाओ…!
बहुत कुछ खो चुके हो…!
जो शेष है, उसे विशेष बनाने का अंतिम अवसर है…!
जो पंचतत्वों को दूषित करने के कारक हैं, उनका त्याग कर दो…!
मशीनीकरण के दुष्प्रभावों को समझो…!
मशीनें तुम्हारी सहायक हों…मैं यह नहीं कहता कि तुम फिर पैदल हो जाओ…!
मैं कहता हूं कि तुम तकनीकी को प्रकृति का मित्र बनाओ…!
यही तुम्हारे कर्णधारों का भविष्य सुनिश्चित करेगा…!
चंद्र शेखर शास्त्री



