आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
श्रीपीतांबरा विद्यापीठ सीकरीतीर्थ
जीवन उसी दिन तक है, जिस दिन तक मनुष्य किसी उद्देश्य के लिए निरंतर रत है…जिस दिन उद्देश्य पूर्ण हुआ, जीवन का लक्ष्य पूर्ण हुआ…लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कर्म बंधन…जो कर्म से बंधा है, उसका जन्म मृत्यु निरंतर है…इसलिए आचरण का अकर्मा हो जाना ही मुक्ति का मार्ग है….न किसी कर्म में लिप्त होना और न किसी से बंधना…निर्लिप्त होकर कीचड़ में कमलवत् जीना ही परमसत्ता का आशीष होता है….!
सुर, असुर, आदित्य, दैत्य, देव, दानव, मानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, पशु, पक्षी, वृक्ष और समस्त, जिनमें जीव मात्र हैं….सब ऋषियों की संतान हैं।
विविधता है, इसलिए मतभेद तो होंगे ही…कोई पूरब को चलता है तो कोई पश्चिम को…सबमें गति है…इसी से प्रगति है… सब अपनी मनोस्थिति पर निर्भर हैं…जन्म, लालन पालन, पोषण और परिवेश उसके लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मनुष्य का जन्मजात स्वभाव है लड़ना…वह मां के गर्भ में हाथ पैर मारता है। मां के स्वभाव और पिता की विचारधारा से उदरस्थ ही प्रभावित होता है…उसके अपने जन्म जन्मांतर के कर्म भी उसके जन्म के कारक होते हैं और उसके संस्कारों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका उन अव्यक्त भोगों की होती है, जो उसके कर्मगत शेष हैं… जब लड़ने पर आएं तो दो अबोध शिशु भी एक दूसरे के बाल नौंच सकते हैं और प्रेम करने पर आएं तो अबोध बच्चा भी अपने मुंह से निकाल कर टॉफी दूसरे को खिला देता है…वह अलग बात है कि सामने वाला बच्चा जब टॉफी को खा लेता है और उस बच्चे के अनुसार वापस उसे नहीं खिलाता है तो पहले वाला जोर से रोता है….यहीं से भावानुगत परीक्षा का परिणाम सामने आने लगता है। यही कारण है कि एक ही घर में, एक ही माता पिता से उत्पन्न संतानें एक से स्वभाव की नहीं होती हैं…उनका पूर्वकृत कर्म उन्हें अलग अलग वृति का बनाता है, अलग अलग प्रवृत्ति का बनाता है, भिन्नता का कारक होता है….क्योंकि कोई किसी भी भाषा में बात करे, किसी भी स्थान पर वास करे, किसी भी व्यवहार में हो…अपने संस्कारों और विचारों से भिन्न नहीं हो सकता….मूल विषय है विचार…क्योंकि विचार की शक्ति ही उसे दूसरे से भिन्न करती है…विचार का प्रवाह ही उसे दूसरे से भिन्न मार्ग पर गति देता है…
वेदांग भी किसी जातक के स्वभाव के लिए उसके देश, काल और परिस्थिति को महत्वपूर्ण बताते हैं और उसी से उसका भविष्य निर्धारित करते हैं….।
जीवन एक पूर्व निर्धारित क्रम है…कर्म और भाग्य की अकाट्य स्थितियों से उत्पन्न…कोई अकर्मा ही उसके फलों से मुक्त रह सकता है…अकर्मा का अर्थ काम न करने वाला निश्चय ही नहीं है। अतः वह निकम्मा नहीं कहा जा सकता है। अकर्मा का अर्थ है जो कर्म के फल का भाव न रखते हुए, किए हुए कर्म का श्रेय त्याग दे….वही अकर्मा है…वही प्राप्त करता है उस परम शक्ति का सायुज्य…वही वास्तविक मोक्ष का अधिकारी….जिसके सभी कर्मों का फल परम शक्ति को ही प्राप्त हो…वह फल के भाव से मुक्त हो। इसी को उपदेश करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा था – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…!
कर्म का लोप होना तो संभव नहीं है, अकर्मा होना संभव है….उसे आचार में लाने की आवश्यकता है…वहीं से आरम्भ होती है एक अंतर्यात्रा…जो आचरण को शुद्ध करती है और सहजता को जन्म देती है…
ध्यान रखना! आप कितने ही बड़े ज्ञानवान् हों, विद्वान् हों, महान् हों….यदि आचरण में सभ्यता नहीं है तो आप आचारहीन हैं….और शास्त्र कहते हैं कि आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः। अर्थात् आचारहीन को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते…इसलिए वस्त्रों से, छद्मभाषण से, छद्माचरण से, एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति से ही सब कौतूहल है…यदि मनुष्य स्वयं को जानने का प्रयास करे तो वह अकर्मा हो जाएगा…यही देवत्व की प्राप्ति का मार्ग है….!
आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
(लेखक राष्ट्रीय ज्योतिष परिषद के अखिल भारतीय अध्यक्ष हैं)
