अमृत कलश
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जो तुम देते हो, वही लौटता है….

आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
श्रीपीतांबरा विद्यापीठ सीकरीतीर्थ

जो तुम देते हो, वही रूपांतरित होकर या विस्तार पाकर तुम्हारे पास लौटता है…वह प्रेम है तो प्रेम….! घृणा है तो घृणा….! ईर्ष्या है तो ईर्ष्या…..! द्वेष है तो द्वेष…..! मान है तो मान…! अपमान है तो अपमान….!
प्रकृति किसी से उधारी नहीं करती…वह विस्तारक है…जैसे अंतरिक्ष बढ़ रहा है, समुद्र बढ़ रहा है, वायुमण्डल बढ़ रहा है, वैसे ही वह सबकुछ बढ़ाती है, इसलिए जो तुम अवचेतन में स्थिर कर लेते हो, वही संप्रेषित होता है और उसी को वापस आना ही होता है…यह सिद्धांत है उसका…जिसे तुम बदल न सकोगे….!
इसलिए जितना सहज रहोगे….उतना सहजता से सब तुमसे मिल सकेंगे…कोई असहज भी तुमसे मिलेगा तो सहज हो जाएगा….!
जितना सरलता से तुम रहोगे…उतनी सरलता से लोग तुमसे व्यवहार कर सकेंगे…निश्चित जानना कि तुमसे धोखा करने वाला भीतर ही भीतर बहुत ग्लानि में होगा…एक दिन अवश्य सोचेगा कि उसने तुम्हारे साथ अपराध किया…और उसका अपराधबोध उसे चैन से बैठने नहीं देगा…उसके अवचेतन में उसका प्रभाव स्थिर हो जाएगा….और एकदिन वह इसका पश्चाताप करना अवश्य चाहेगा…नहीं तो बंधा रहेगा बंधन से और मन स्वच्छ न हो सकेगा….!
तुम जितने तमतमाए हुए रहोगे, तुमसे मिलने वाला स्वयं तमतमा जाएगा…क्योंकि तुम्हारी ऊर्जा सामने जाकर उसे प्रभावित कर रही है और बहुगुणा होकर तुम तक लौट रही है….!
यह रीति है प्रकृति की…जो दोगे, वही पाओगे….तुम सुख बांटोगे तो संभव है कि कुछ समय कांटे मिलें…क्योंकि नकारात्मकताएं नष्ट नहीं होती हैं…ऊर्जा का सिद्धांत है कि वह नष्ट नहीं हो सकती… हां! रूपांतरित होती है…लेकिन यह रूपांतरण होते होते होता है…एकदम से बीज से वृक्ष नहीं उगा करते…धीरे धीरे बीज का स्वरूप नष्ट होता है और वृक्ष बनता है….यह एक लंबी प्रक्रिया है…लेकिन अनवरत है….इसीलिए अनेक बार देखा गया है कि सोया हुआ बीज पत्थर को फोड़कर भी अपनी जड़ें जमा लेता है…सुकोमल जड़ें…कठोर पत्थर…कोई प्रतिस्पर्धा हो सकती है क्या…!…लेकिन सुकोमल जड़ें पत्थर में भी अपने अनुकूल ठिकाना बना लेती हैं…
तो तुम्हें निर्धारित करना है कि तुम्हें होना क्या है….! संसार को देना क्या है….! और संसार से लेना क्या है…!
ध्यान रखना!
संसार न लेता है और न कुछ देता है…केवल तुम्हारे अवचेतन की अमित धारणाएं ही तुम्हें सुख और दुःख का अनुभव कराती हैं…इसलिए यह तुम्ही पर निर्भर है कि क्या चाहते हो….! कैसा जीवन चाहते हो….!

आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
(लेखक राष्ट्रीय ज्योतिष परिषद के अखिल भारतीय अध्यक्ष हैं)

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