आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
जिसने आलोचना को पचा लिया, उससे शक्तिशाली कोई नहीं…क्योंकि आलोचना ही परम ऊर्जा है…जो असंभव को संभव बनाती है।
इसीलिए कबीर कह गए….
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।
जैसे ही आलोचना का वज्रपात होगा…बिजली पूरे शरीर में कौंध जाएगी…लगेगा कि सब जल गया…अब कुछ बचेगा ही नहीं….संसार व्यर्थ हो गया….अस्तित्व की एक गहन छटपटाहट जन्म ले लेगी….
और जिसे यह छटपटाहट नहीं होगी, वह या तो जीवित ही नहीं है…या उसे परमात्मा ने पृथ्वी पर ही आश्रय देकर अपना वास्तविक पुत्र स्वीकार लिया है…क्योंकि जिस पर उसकी कृपा हो गई हो, वह आलोचना या प्रसंशा के चक्र में नहीं आता…वह तो उस परम पिता का शरणागत हो चुका होता है, जिसके पास इन सबका समय ही नहीं है…आनंद से परमानंद की ओर जाने वाला पथिक….उसे कोई अंतर नहीं पड़ता कि प्रशंसा हुई या आलोचना…इसीलिए शोधकर्ताओं ने पाया कि जीनियस (असाधारण क्षमतासंपन्न) व्यक्ति और पागल में कुछ विशेष अंतर नहीं होता…पहली दृष्टि में दोनों एक से लग सकते हैं…उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप प्रसन्न हैं या क्रुद्ध…मित्र हैं या शत्रु, भूखे हैं या भरे पेट…विद्वान हैं या अंगूठानंद…विवाहित हैं या कुंआरे, संन्यासी हैं या गृहस्थ…अपनी अलग माया है…तीन लोक से न्यारी…
तो छटपटाहट से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा सांसारिकों को अवश्य ही पीड़ित करती है…उसका वेश कुछ भी हो, कुल कैसा भी हो, धन हो या न हो, लोकेष्णा, वित्तेष्णा, पुत्रेष्णा पर यह छटपटाहट अत्यंत भारी होती है…इसीलिए यह परम ऊर्जा जैसी शक्तिशाली है…आलोचनाएं, संसार की गति बदल सकती हैं…आलोचनाएं ग्रहों की गति बदल सकती हैं…नक्षत्रों का प्रभाव बदल सकती हैं…आम आदमी की तो बात छोड़िए, जो हिमालय से भी अधिक ऊंचाई को प्राप्त हो चुके हैं और सत्ता हिलती देखते हैं तो वे भी इससे मुक्त नहीं हो सके हैं….
कह सकते हैं कि पूरा ब्रह्मांड ही आलोचना से चल रहा है…और आलोचना की ऊर्जा को जो समझ गया और झेल गया…वह उस परम शक्ति को प्राप्त हो जाता है, जिसे कोई गिरा नहीं सकता…इसलिए आलोचना को अच्छे अर्थों में लीजिए…आपकी आलोचनाओं करके कुछ लोग अतिप्रसन्न होते हैं…यह कितनी खुशी की बात है कि आपकी आलोचना से किसी को सुख मिला…आपकी आलोचना का विस्तार तब होता है, जब कोई व्यक्ति अपना मिशन बना ले कि आपकी आलोचना करनी है, भले ही वह आपको न तो जानता हो, न कभी मिला हो और न ही आपके स्वभाव से परिचित हो….उस व्यक्ति का हृदय से धन्यवाद करना चाहिए और अवसर मिले तो उसका सम्मान करना चाहिए…क्योंकि जितना प्रचार उसने आपका मुफ्त में कर दिया, उतना आप लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं कर पाते…जिन जिन लोगों ने आपकी आलोचना सुनकर अपना मानस आपके विरुद्ध बनाया, उनकी नकारात्मक ऊर्जा की असीम वृद्धि हुई, जो आपकी नकारात्मकता को खींच ले गई…और आप निर्मल हो गए…यह निर्मलता उन आलोचकों की कृपा के बिना कैसे होती….
और एक दिन, जब कोई अज्ञात आलोचक आपके पास आए और आपके व्यवहार और विचारों को देखकर समझ ले कि उसने किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के विरुद्ध कितना विष वमन किया है तो वह स्वयं आत्मग्लानि से भर जाएगा…और उसके बाद वह आपका निःशुल्क प्रचारक होगा…वह एक व्यक्ति जो आपके मिलकर सकारात्मकता को प्राप्त हुआ…वह एक ही उस पवित्र ऊर्जा को संसार में संप्रेषित करेगा और आपकी आलोचना ही आपकी प्रसंशा में परिवर्तित हो जाएगी….इसलिए आलोचना से डरिए मत…उसका सामना कीजिए…गहरे से छटपटाइए…अपने संकल्प को दृढ़ कीजिए और संसार को दिखाइए कि आप संसार के लिए क्या कर सकते हैं….अपनी ऊर्जाओं को एकत्रित करें और कर्मशील बनें…एक दिन आयेगा कि चाकू की नोक से फूल बरसेंगे….आलोचना के कर्कश स्वर प्रशंसा के संगीत से भर जाएंगे और संसार आपकी ओर देखेगा….
उसे अवसर तो दीजिए…. अर्थात् आलोचना के पात्र बनिए। बनिएगा… बिगड़िएगा मत।

बहुत खुबसूरत लेख शास्त्री जी 🌺
धन्यवाद बन्धु