आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
श्रीपीतांबरा विद्यापीठ सीकरीतीर्थ
तुम जैसे हो, नैसर्गिक हो। मगर निसर्ग के भी और आयाम हैं। बीज नैसर्गिक है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि बीज अब बीज ही रह जाए। बीज को वृक्ष भी होना है। वृक्ष भी नैसर्गिक है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वृक्ष वृक्ष ही रह जाए। वृक्ष को अभी फूल भी खिलाने हैं। फूल भी नैसर्गिक हैं। मगर इसका यह अर्थ नहीं है कि फूल फूल ही रह जाएं। फूल को सुगंध बन कर आकाश में उड़ना भी है। जब तक बीज, कंकड़-पत्थर जैसा दिखाई पड़ने वाला बीज, अदृश्य सुवास बन कर आकाश में न उड़ने लगे, तब तक तृप्त मत होना, तब तक सांत्वना मत खोजना।….क्योंकि सांत्वनाएं तुम्हारे स्वत्व को नकार देंगी…तुम्हारे होने का अर्थ ही नष्ट कर देंगी…तात्कालिक स्तर पर सांत्वनाएं तुम्हें आश्रय तो दे सकती हैं, लेकिन वह आश्रय तुम्हें भारी पड़ेगा…तुम्हारे विकासक्रम का बाधक होगा…क्योंकि आश्रय कभी भी नैसर्गिक नहीं होता…वह शक्ति का विकेंद्रीकरण कर देता है…और आपके संघर्ष की क्षमताओं को प्रभावित करता है। इसलिए स्वयं के प्रति निष्ठावान होकर स्वयं को जाग्रत करना ही जीवन की प्राथमिकता हो…उससे तुम्हारा अवचेतन तुम्हें प्रेरित कर सकेगा…और चेतना तुम्हें सही मार्ग दे सकेगी…
तुम्हारे अवचेतन में सुप्त बीज जाग सकेगा…उसका विस्तार हो सकेगा…बीज तभी अपने कवच को तोड़कर बाहर आ सकेगा और पुष्पित पल्लवित हो सकेगा…हवाओं के तेज झोंके उसे संभलने के लिए चेष्टा उत्पन्न करेंगे…सूरज का ताप उसे अपने परिवेश की ऊष्मा को सहन करने और ऊर्जान्वित होने का अवसर देंगे, जल उसे अभिसिंचित कर सकेगा…पीड़ाओं के आंसू जब अंदर की ओर बहेंगे तो वे आंसू भी पोषण देकर आनंद की धारा का मार्ग बनाएंगे…क्योंकि बिना पीड़ा के न तो उत्पत्ति होती है और न ही विकास…इसलिए जिसने भी उन्नति की है, उत्कर्ष पाया है, उसने पीड़ाओं को आनंद में परिवर्तित करने की कला को अवश्य सीखा है। …और जब तक जमीन में जड़ न न फैलेंगी, तब तक वह स्थिर न हो सकेगा…अपना अस्तित्व न बचा सकेगा…अवसर आयेगा कि पृथ्वी उसकी जड़ों को अपनी ओर आकर्षित करेगी और वह स्थापित हो सकेगा…जड़ें ही उसके शक्तिशाली होने का मार्ग होगा…जो लोग अपनी जड़ों से जुड़े होते हैं और उन्हें मजबूती से धरती के वक्षस्थल का दुग्धपान कराते हैं, वे बिना बरसात के, बिना बाहरी जल के भी मजबूती से विस्तार पाते हैं….और गमले में उगे लोग….गमला अर्थात आश्रय…आश्रय में लगा बीज…उगेगा तो अवश्य…लेकिन जब तक भूमि में रोपित नहीं होगा, उसका असीम विस्तार न हो सकेगा…ग्लैम में उगे लोग…कभी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं…वे खिलते हैं…मुस्कुराते हैं…गुनगुनाते भी हैं….लेकिन आत्मनिर्भर नहीं होते हैं….आत्मनिर्भर वही होगा, जो भूमि में स्वयं प्रगट या रोपित होगा..
.तुम्हारा रोपण तुम्हारा परिवेश करता है, तुम्हारा संघर्ष उसे शक्ति प्रदान करता है और एक दिन आता है कि तुम एक विशाल वृक्ष में परिवर्तित हो जाते हो…लेकिन यह सब अचानक नहीं होता…वर्षों की साधना धीरे धीरे अभ्यास के बाद प्रतिक्षण से सीखने की लालसा और करने का दृढ़ संकल्प…अदम्य साहस और असीम उत्साह….पृथ्वी से आकाश को छू लेने की कल्पना और छा जाने का भाव…ये सब तभी हो सकते हैं, जब टेढ़मेढ़े रास्तों पर जूझते हुए तुमने हर संकट का डटकर सामना किया हो।…विषमताओं को पराजित किया हो…स्वयं का जागरण किया हो….
तभी वेद कह पाएंगे कि
यो जागारः तं रिच: कामयन्ते
एक दिन आयेगा जब वेद तुम्हारी स्तुति करेंगे…संसार तुम्हारे गुण गाएगा…पीढ़ियां तुम्हारे कार्यों का अनुसरण करेंगी…और इतिहास तुम्हें याद रखेगा….
उठो…! सारा आकाश तुम्हारा है…….
आचार्य चंद्रशेखर शास्त्री
